महर्षि वेदव्यास ने कहा है

सुरा मत्स्याः पशोर्मास द्विजातीनां बलिस्तथा।
धूर्तेः प्रवर्तितं यज्ञे, नैतद् वेदेषु कथ्यते ॥
-महाभारत, शांतिपर्व 15

अर्थात् मद्य (शराब), मछली और पशुओं का मांस और यज्ञ में द्विजाति आदि मनुष्यों की बलि चढ़ाने की प्रथा धूर्तों के द्वारा चलाई गई है, यानी दुष्ट प्रवृत्ति के राक्षसों ने मांस भक्षण हेतु यज्ञ में इसे आरंभ किया है। वेदों में मांस खाने का विधान नहीं दिया गया है।
जिस प्रकार मुसलमान बकरीद के दिन बकरे की कुर्बानी करते हैं, उसी की तर्ज पर कुछ हिंदुओं ने भैरव, भवानी आदि कुछ देवी-देवताओं के नाम पर मांसाहार के लोभ में पशुबलि चढ़ाने की प्रथा आरंभ कर दी। यवन शासन काल में मांसाहार काफी चल पड़ा था। मांसाहार के लोभी कुछ लोगों ने षड्यंत्र करके ऐसे श्लोक लिखवाए जिसमें देवी माता भी पशु-पक्षियों की बलि चाहती हैं और उसका मांस प्रसाद के रूप में खाना पसंद करती हैं। ये कुछ पुराणों में जोड़ दिए गए हैं। वैसे तमाम हिंदू धर्म ग्रंथों में मांस को अभक्ष्य तथा असुरों का भोजन माना गया है। मांस खाने की आज्ञा किसी ग्रंथ में नहीं दी गई है।

उल्लेखनीय है कि यदि देवी-देवता मांस लोलुप हैं, जीव-हत्या/बलि से प्रसन्न होते हैं, करुणा को छोड़कर नृशंस आचरण करने की प्रेरणा देते हैं, तो उनमें और असुरों में क्या अंतर रह जाएगा ?

धर्म के नाम पर निरपराध मूक पशुओं की निर्दयता पूर्वक हत्या करना और अपनी स्वार्थ सिद्धि, मनोकामनाओं को पूरी करने के लिए देवी-देवताओं को किसी के जीवन की रिश्वत भेंट करना सर्वथा अनुचित कार्य है। ऐसे पाप कर्म के बदले में सुख, धन-दौलत, सौभाग्य, संतान का वरदान मिलना सर्वथा असंभव बातें हैं। इससे न तो देवी माता को प्रसन्नता मिलती है और न धन, संतान आदि ही प्राप्त होते हैं। अपवाद स्वरूप कहीं कोई सफलता मिल जाए, तो वह भी अनैतिक ही कही जाएगी, क्योंकि पाप कर्म के बदले दुख और नरक की यातना ही मिलती है।

वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत् में कहा है कि जो विधि विरुद्ध पशुओं की बलि देकर भूत और प्रेतों की उपासना में लग जाए, वह पशुओं से भी गया-बीता हो जाता है और अवश्य ही नरक में जाता है। उसे अंत में घोर अंधकार, स्वार्थ और परमार्थ से रहित अज्ञान में ही भटकना पड़ता है।

सृष्टि के प्रारंभ में देवताओं ने महर्षियों से कहा-“श्रुति कहती है कि यज्ञ में अजबलि होनी चाहिए। अज बकरे का नाम है, फिर आप लोग उसका बलिदान क्यों नहीं करते?’
महर्षियों ने कहा-‘बीज का नाम ही अज है। बीज यानी अन्नों से ही यज्ञ करने का वेद निर्देश करता है। यज्ञ में वध सज्जनों का धर्म नहीं है।’