मानव जीवन का लक्ष्य है, पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चतुर्विध पुरुषार्थ की प्राप्ति में आरोग्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। कहा भी गया है –
धर्मार्थ काममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्।
(च० सू० १।१५)

महाकवि कालिदास ने शिव-पार्वती-संवाद में एक महत्त्वपूर्ण उक्ति लिखी है—‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।
शरीर ही धर्मकी साधना का प्रमुख साधन है। यह तो सत्य है कि मानव शरीर पाञ्चभौतिक होने के कारण नश्वर है, अन्ततः नष्ट होने वाला है, तथापि वह ऐसी क्षुद्र वस्तु भी नहीं है जिसकी उपेक्षा की जाय। जब कबीर ने मानवशरीर को ‘पानी का बुदबुदा’ बताया तो उनका भाव यही था कि सीमित कालावधि के लिये जन्म लेनेवाले मनुष्य को उचित है कि वह यथाशीघ्र परमात्मा को पहचाने तथा श्रेयो मार्ग का पथिक बने ।

✦ वैदिक संहिताओं में मानव को स्वस्थ तथा नीरोग रहने की बार-बार प्रेरणा दी गयी है। वस्तुतः वेद मानव के हितकी विधाओं तथा विज्ञानों का भण्डार है, भगवान् मनु के अनुसार वेद पितर, देव तथा मनुष्यों के मार्गदर्शन के लिये सनातन चक्षुओं के तुल्य हैं, जिनसे लोग अपने हित और अहितको पहचानकर कर्तव्याकर्तव्य का निर्धारण कर सकते हैं। मानवस्वास्थ्य के लिये उपयोगी शरीर विज्ञान तथा स्वास्थ्यरक्षा का विशद निरूपण इस वाङ्मय में उपलब्ध है। वेदों की दृष्टि में यह शरीर न तो हेय है और न तिरस्कार के योग्य।

✦ वेदों में मनुष्य के लिये दीर्घायु की कामना की गयी है, जो शरीर-नीरोग होने से सम्भव है।
आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पतां चक्षुर्यज्ञेन कल्पताश्रोत्रं यज्ञेन कल्पताम्’ (यजु० ९ । २१)
आदि मन्त्रों में मनुष्य के दीर्घायु होने तथा स्वजीवन को लोकहित (यज्ञ)-में लगाने की बात कही गयी है। यह तभी सम्भव है जब उसके चक्षु तथा श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ और पञ्चप्राण पूर्ण स्वस्थ एवं बलयुक्त रहें। वेदों में ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को बलिष्ठ, स्वस्थ तथा यशस्वी बनाने के लिये कहा गया है।
‘प्राणश्च मेऽपानश्च मे’ (यजु० १८।२) मन्त्र में प्राण, अपान तथा व्यान आदि को स्वस्थ रखनेके साथ-साथ वाक्, मन, नेत्र तथा श्रोत्र आदि को भी बलयुक्त रखने की बात कही गयी है।

✦ संध्योपासना के अन्तर्गत उपस्थान-मन्त्र में स्पष्ट कहा गया है कि उसके नेत्र, कान तथा वाणी आदि इतने बलवान् हों, जिनसे वह सौ वर्षपर्यन्त पदार्थों को देखता रहे, शब्दों को सुनता रहे, वचनों को बोलता रहे। तथा स्वस्थ एवं सदाचारयुक्त-जीवन जीता रहे। केवल सौ वर्षपर्यन्त ही नहीं, उससे भी अधिक ‘भूयश्च शरदः शतात्’ । वैदिक उक्ति में शरीर को पत्थर की भाँति सुदृढ़ बनानेकी बात कही गयी है-‘अश्मा भवतु ते तनूः’।

✦ आरोग्यलाभ के विविध साधनों तथा उपायों की चर्चा भी वेदों में आयी है। उष:काल में सूर्योदय से पूर्व शय्यात्याग को स्वास्थ्य के लिये अतीव उपयोगी बताया गया है। इसलिये वेदोंमें उषा को दिव्य ज्योति प्रदान करनेवाली तथा सत्कर्मों में प्रेरित करनेवाली देवी के रूपमें चित्रित किया गया है। जब प्रात:कालमें संध्याके लिये बैठते हैं तो हम उपस्थान-मन्त्रों का उच्चारण करतेहैं। उसी समय हमें पूर्व दिशा में भगवान् भास्कर उदित होते दिखायी देते हैं। इस पवित्र तथा स्फूर्तिदायिनी वेला में साधक एक ओर तो आकाश में उदित होनेवाले मार्तण्डको देखता है, दूसरी ओर वह अपने हृदयाकाश में प्रकाशयुक्त परमात्मा के दिव्य लोक का अनुभव कर कह उठता है
उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम्। देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्॥
(यजु० २० । २१) अर्थात् अंधकारका निवारण करने वाला यह ज्योति:पुञ्ज सूर्य प्राची दिशा में उदित हुआ है, यही देवों का देव परमात्मारूपी सूर्य मेरे मानस-क्षितिजपर प्रकट हुआ है और इससे नि:सृत ज्ञानरश्मियों की ऊष्मा का मैं अपने अन्त:करणमें अनुभव कर रहा हूँ।
यो जागार तमृचः कामयन्ते (ऋक्० ५।४४ । १४) ऋग्वेदकी इस ऋचामें स्पष्ट कहा गया है कि जो जागता है, जल्दी उठकर प्रभुका स्मरण करता है, ऋचाएँ उसकी कामना पूरी करती हैं। सामादि अन्य वेदोंका ज्ञान भी उष:कालमें उठकर स्वाध्याय में प्रवृत्त होने वाले व्यक्ति के लिये ही सुलभ होता है। आलसी, प्रमादी, दीर्घसूत्री तथा देरतक सोते रहनेवाले लोग सौभाग्य और
आरोग्य से वञ्चित रहते हैं। जल्दी उठकर वायुसेवन के लिये भ्रमण करना चाहिये। इस सम्बन्ध में वेद का कहना है कि पर्वतों की उपत्यकाओं में तथा नदियों के संगम स्थल पर प्रकृति की छटा अवर्णनीय होती है। यहाँ विचरण करनेवाले अपनी बुद्धियों का विकास करते हैं
उपह्वरे गिरीणां संगथे च नदीनाम्। धिया विप्रो अजायत॥
(ऋक्० ८।६। २८).

✦ शरीर को स्वस्थ और नीरोग रखने के लिये शुद्ध, पुष्टिदायक, रोगनाशक अन्न तथा जलका सेवन आवश्यक है। जल के विषय में वेद कहता है-
‘आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे’ (यजु० ११।५०)।
भाव यह है कि जल हमें सुख प्रदान करनेवाला तथा ऊर्जा प्रदान करनेवाला हो।

✦ अन्नविषयक अनेक मन्त्र वेदों में आये हैं। जिन पुष्टिकारक व्रीहि, गोधूम, मुद्ग आदि अन्नों का हम सेवन करें, उनकी गणना निम्न मन्त्र में की गयी है-‘व्रीहयश्च मे यवाश्च मे माषाश्च मे तिलाश्च मे मुद्गाश्च मे खल्वाश्च मे” गोधूमाश्च मे मसूराश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्’ (यजु० १८।१२)
भोजन में गोदुग्ध का सेवन अत्यन्त आवश्यक है।
वेदों में गोमहिमा के अनेक मन्त्र आये हैं। गायकी महत्ताका वर्णन करते हुए उसे रुद्रसंज्ञक ब्रह्मचारियों की माता, वसुओं की दुहिता तथा आदित्यसंज्ञक तेजस्वी पुरुषोंकी बहिन कहा गया है-
‘माता रुद्राणां दुहितावसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः’ (ऋक्० ।८।१०१।१५)।
अथर्ववेदके मन्त्र में गायों को सम्बोधित कर कहा गया है कि आप कृश तथा दुर्बल व्यक्तिको पुष्ट और स्वस्थ बना देती हैं। उसके शरीर की सौन्दर्य वृद्धि का कारण आपका दुग्ध ही है। ‘यूयं गावः’ आदि अथर्वमन्त्र इसके प्रमाण हैं।

✦ अन्नके विषयमें वेदमें कतिपय आवश्यक निर्देश मिलते हैं। प्रथम तो यह कहा गया है कि अन्नपति परमात्मा ही हैं। वे ही हमें रोगरहित तथा बलवर्द्धक अन्न प्रदान करते हैं। वे इतने उदार तथा समदर्शी हैं कि दो पैरोंवाले मनुष्यों तथा चौपाये जानवरों-सभी प्राणियों को अन्न प्रदान करते हैं
अन्नपतेऽन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः।
प्र प्रदातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे॥
(यजु० ११ । ८३)

✦ भोजन के विषय में एक अन्य प्रसिद्ध मन्त्र निम्न है
मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत् स तस्य।
नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी॥
(ऋक्० १०॥ ११७।६) ।
अर्थात् अकेला खानेवाला, अन्योंको भोजनादि से वञ्चित रखनेवाला वास्तव में पाप ही खाता है। ऐसा स्वार्थी व्यक्ति न तो स्वयं को ही पोषित करता है और न अपने मित्रों को। भगवान् श्रीकृष्ण ने वेदकी इसी उक्तिको इस प्रकारसे बताया।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
(गीता ३।१३)
जो पापी अपने लिये ही पकाते हैं, वे वस्तुत: पाप ही खाते हैं।

✦ आहार और अन्न की शुद्धता के अनेक निर्देश वेदाश्रित उपनिषदादि ग्रन्थों में भी मिलते हैं, वहाँ कहा गया है-
आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः ॥
(छा० उ० ७॥ २६ । २)

अर्थात् सात्त्विक आहार-ग्रहण करने से मन की शुद्धि होती है और मन के शुद्ध होने पर अविचलित स्मृति प्राप्त होती है।

✦ उपनिषदों में ही अन्न की निन्दा न करने का उपदेश दिया गया है-‘अन्नं न निन्द्यात् तद् व्रतम्’। भोजन आदि की भाँति शान्त और स्थिर निद्रा भी आरोग्यके लिये आवश्यक है। ऋग्वेदीय रात्रिसूक्त (१०।१२७)-में इसका सुन्दर विवेचन हुआ है।

✦ रात्रि में उचित समय पर सोना स्वास्थ्य के लिये जरूरी है। वेद में रात्रि को द्युलोक की पुत्री कहा गया है। यह रात्रि वस्तुतः उष:कालमें बदलकर अन्धकार का विनाश करती है-
ज्योतिषा बाधते तमः’ (ऋक्० १०॥ १२७। २)

✦ मनुष्य का नीरोग और स्वस्थ रहना केवल शरीर रक्षण से ही सम्भव नहीं है। इसी अभिप्राय से उपनिषद् पञ्चकोशों का उल्लेख करते हैं, जिन में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश तथा मनोमय कोश के बाद ही विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश की चर्चा हुई है। स्वस्थ प्राण शक्ति आरोग्य का प्रमुख कारण बनती है। वेदों ने तो प्राणों को परमात्मा का ही वाचक माना है
‘प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे’ (अथर्व० ११।४।१)
इसी अभिप्राय को भगवान् बादरायण ने अपने सूत्र
‘अतएव प्राणः’ में कहा है। प्राण नाम से परमात्मा ही कथित हुए हैं।

✦ आरोग्य का एक महत्त्वपूर्ण साधन है ब्रह्मचर्य। इसके पालन की महिमा के लिये अथर्ववेद का ब्रह्मचर्य-सूक्त द्रष्टव्य है। वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि ब्रह्मचर्य रूपी तप के द्वारा विद्वान् देवगण मृत्यु पर भी विजय पा लेते हैं‘ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत’ (अथर्व० ११।५।१९)

✦ अथर्ववेद में रोग, रोगके कारणों, उनके निवारणके उपायों, रोगनाशक औषधियों एवं वनस्पतियों तथा रोग दूर करनेवाले वैद्यों (भिषक्) आदि की विस्तृत चर्चा मिलती है। ये सभी प्रकरण शारीरिक स्वास्थ्य से ही सम्बद्ध हैं।

✦ मनोवैज्ञानिक चिकित्साके संकेत भी वेदोंमें मिलते हैं। ‘यज्जाग्रतो दूरमुपैति दैवं०’ (यजु० ३४॥ १६) आदि मन्त्र मन की दिव्य शक्तियों का उल्लेख कर उसे शिवसंकल्पवाला बनाने की बात करते हैं।

✦ स्पर्श पूर्वक रोगनिवारणके संकेत भी अथर्ववेदके ‘अयं मे हस्तो भगवानयं मे भगवत्तरः’ (अथर्व ४। १३ । ६) आदि मन्त्रों में मिलते हैं, जिसमें सहानुभूति प्रवण वैद्यका कोमल स्पर्श रोगीके लिये औषधि का काम करता है।