सूर्य प्रकाश से चर्म रोग का उपचार :

इस सदी के प्रारंभ से ही प्रकाश का उपयोग चिकित्सा में होता आया है। सन् 1903 में डेनमार्क के शोधकर्ता डॉ. एन. आर. फिनसेन को इसीलिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था कि उन्होंने यह राह दिखाई कि फोटोथैरेपी द्वारा त्वचा की ट्यूबर-क्यूलोसिस-ल्यूपस वल्गेरिस-का उपचार संभव है।
आज भी सोरियासिस नामक त्वचा विकार में दवा के साथ-साथ अल्ट्रावायलेट प्रकाश किरणें ही उपचार का आधार हैं।
इसी तरह विटिलिगो (सफेद दाग) के उपचार में भी दवा लगाने के बाद सूर्य के प्रकाश में बैठना कई मामलों में उपयोगी साबित होता है। नवजात शिशुओं में जॉन्डिस (पीलिया) के इलाज के लिए भी फोटोथैरेपी गुणकारी पाई गई है।

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सूर्य सेवन तथा जंगम सृष्टि :

सूर्य समस्त स्थावर तथा जंगम सृष्टि का प्राण स्वरूप है । देवगण का अद्भुत मुख्य रूप तथा मित्र जल, अग्नि का नेत्र रूप सूर्य उदय हो गया । जो उसने आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष को सब ओर से प्रकाशित कर दिया । अगर सूर्य प्रकाश ठीक ढंग से न मिले या उससे बिलकुल वंचित रहना पड़े तो मनुष्य थोड़े समय में ही अवश्य ही बिलकुल निर्बल और अस्वस्थ हो जाएगा।

मानव शरीर संसार में हमें जितनी प्रकार की शक्तियां दिखाई पड़ती हैं उन सबका मूल रूप सूर्य में ही है । जल का बहना, वायु का चलना, अग्नि का जलना, पृथ्वी का भांति-भांति की वनस्पतियों को उत्पन्न करना आदि सब का आधार सूर्य ही है । मानव शरीर में जो अनेक रसायनिक तत्त्व पाए जाते हैं, उनमें फॉस्फेट या कैल्शियम की गणना प्रधान द्रव्यों में की जाती है । सूर्य की धूप जब हमारी चमड़ी पर लगती है तो उससे रक्त में ऊष्णता आती है ।

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वैदिक साहित्य में पृथ्वी को रज और सूर्य को वीर्य की उपमा दी गई है । पृथ्वी की उत्पादक शक्ति में प्राण डालने वाला यह सविता सूर्य देव ही है । जो प्राणी सूर्य के जितने ही निकट सम्पर्क में रहते हैं उतने ही स्वस्थ और सजीव पाए जाते हैं। जिन पेड़ -पौधों, लताओं तथा पशु-पक्षी, जीव- जन्तु और मनुष्य को सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता वह या तो बढ़ते-पनपते ही नहीं, यदि वह पनपते भी हैं तो उनमें चैतन्यता, ताजगी और जीवन शक्ति नहीं रहती या फिर बहुत मंद रहती है । सूर्य के प्रकाश से वंचित रहने वाले प्राणी प्राय: पीले-पीले से निस्तेज मुरझाये हुए बीमार या फिर अविकसित रहते हैं।

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जिस बालक को धूप से बचा कर रखा जाता है वह सुन्दर और बुद्धिमान बनने की बजाए कुरूप और मूर्ख बनता है । जहां सूर्य की सीधी किरणें नहीं पहुंचती वहां की अंधेरी कोठरियों में जो लोग निवास करते हैं, उनकी मूर्खता भरी बात सुनकर वहां पर पहुंचने वाले यात्री आश्चर्यचकित रह जाते हैं। उनमें अनेक लोग साफ-साफ बोल नहीं पाते, अनेक अंधे होते हैं अनेक बहरे होते हैं। गांव में खुले प्रकाश में रहने वाले, गरीब तथा किसान का स्वास्थ्य शहर की अंधेरी कोठरियों में रहने वालों से कई गुना अच्छा होता है।

सावधानी :

जैसे किसी भी चीज की अति भली नहीं होती, उसी तरह प्रकाश, खासतौर से अल्ट्रावॉयलेट प्रकाश की बहुतायत भी त्वचा के लिए अच्छी नहीं।

वैज्ञानिकों ने पाया है कि ज्यादा मात्रा में अल्ट्रावॉयलेट प्रकाश किरणें ग्रहण करने से त्वचा पर उम्र से पहले ही झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और श्वेत वर्ण के लोगों में त्वचा के कैंसर की आशंका भी बढ़ जाती है।