शिरः शूलादिवज्र रस क्या है ? Shir Shuladi Vajra Ras in Hindi

शिरः शूलादिवज्र रस टेबलेट रूप में एक आयुर्वेदिक दवा है, जिसका उपयोग सिरदर्द, माइग्रेन, तनाव सिरदर्द, संवहनी सिरदर्द आदि के आयुर्वेदिक उपचार में किया जाता है। इस दवा में भारी धातु सामग्री (भस्म) होती है, इसलिए केवल सख्त चिकित्सा पर्यवेक्षण के तहत ही इस दवा को लिया जाना चाहिए।

शिरः शूलादिवज्र रस के घटक द्रव्य :

✦ शुद्ध पारा
✦ शुद्ध गन्धक
लौह भस्म
✦ ताम्र भस्म
✦ शुद्ध गुग्गुलु
✦ त्रिफला चूर्ण
✦ कूठ
✦ मुलेठी
✦ गोखरू
✦ वायविडंग
✦ दशमूल

शिरः शूलादिवज्र रस बनाने की विधि :

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लौह भस्म, ताम्र भस्म-प्रत्येक ४-४ तोले, शुद्ध गुग्गुलु १६ तोले, त्रिफला चूर्ण ८ तोले तथा कूठ, मुलेठी, गोखरू, वायविडंग और दशमूल-प्रत्येक १-१ तोला लें। प्रथम पारा-गन्धक की कज्जली बना लें फिर उसमें अन्य औषधियों का चूर्ण मिलाकर दशमूल क्वाथ में घोंटे और हाथ में घी लगाकर ४-४ रत्ती की गोलियां बना, छाया में सूखा कर रख लें। – मै. र.
वक्तव्य – दशमूल के प्रत्येक प्राप्य द्रव्य की मात्रा एक-एक तोला डालना चाहिए।

उपलब्धता : यह योग इसी नाम से बना बनाया आयुर्वेदिक औषधि विक्रेता के यहां मिलता है।

शिरः शूलादिवज्र रस सेवन विधि ,मात्रा और अनुपान :

१ से २ गोली सुबह-शाम। १ माशा गोदन्ती हरिताल भस्म और मिश्री मिलाकर बकरी या गाय के दूध के साथ अथवा जल के साथ दें।

शिरः शूलादिवज्र रस के फायदे ,गुण और उपयोग : Shir Shuladi Vajra Ras ke Fayde

• इस रसायन के सेवन से वातज-पित्तज और कफज सब प्रकार के सिर-दर्द नष्ट होते हैं।( और पढ़ेसिर दर्द के 41 घरेलू नुस्खे)

• सिर दर्द – स्वतन्त्र अथवा किसी रोग के उपद्रव रूप से दो तरह के होते हैं। स्वतन्त्र रूप से आयुर्वेद में ११ प्रकार के सिर-दर्द बताए गये हैं। यथा-वात, पित्त, कफ, सन्निपात, और रक्त के प्रकोप से , क्षय व कृमि से, सूर्यावर्त, अनन्तवात, अर्धावभेदक, शंखक इस तरह सब ११ हैं। इसके अतिरिक्त प्रायः देखा जाता है कि कोई भी रोग क्यों न हो सिर दर्द उसमें होता ही है। ऐसा क्यों होता है? सम्पूर्ण शरीर का केन्द्रस्थान सिर है यहीं से शरीर-रूपी दुनिया का संचालन होता है। अतएवं, शरीर के किसी भी अवयव में तकलीफ होते ही उसका असर प्रथम मस्तिष्क पर पड़ता है। अतः जब तक वह अंग स्वस्थ नहीं हो जाता, सिर-दर्द होता रहता है।

• कभी-कभी ऐसा भी होता है कि रात में विशेष जागरण, अधिक परिश्रम, मानसिक चिन्ता, जुकाम आदि कारणों से भी सिर दर्द होने लगता है, क्योंकि उक्त सब कारण वातप्रकोपक हैं। अत: इन कारणों से वात-प्रकुपित हो, सिर में दर्द होने लगता है । इनमें यदि शिरः शूलादिवज्र रस का उपयोग किया जाय, तो बहुत सफलता मिल सकती है, क्योंकि इस रसायन में गुग्गुलु की मात्रा विशेष होने से इसका प्रभाव वात और रक्तवाहिनी नाड़ियों पर विशेष होता है। गुग्गुल वात प्रशमन के लिए प्रसिद्ध है और दर्द बिना वात के होता नहीं। अतएवं यह रसायन हर प्रकार के सिर-दर्द में फायदा करता है। — औ. गु. ध. शा.

• अर्धावभेदक (धूबा या अर्द्धकपाली), सूर्यावर्त (प्रात:काल सूर्योदय से दोपहर तक बढ़नेवाला सिर-दर्द) में गोदन्ती भस्म के साथ मिला पथ्यादि क्वाथ के साथ कुछ समय तक लगातार सेवन करने से रोग जड़ से मिट जाता है। कितने ही रोगियों पर प्रयोग करके हमने इस उत्तम लाभजनक अनुभव किया है।( और पढ़ेआधा सिर दर्द की छुट्टी करदेंगे यह 27 घरेलू इलाज)

• मस्तिष्क की कमजोरी के कारण होनेवाले सिर-दर्द में इसके सेवन के साथ-साथ बादाम और मिश्री को मक्खन में मिलाकर या दूध के साथ सेवन करने बहुत. उत्तम एवं स्थायी लाभ होता है। इसके सेवन से दिमाग पुष्ट हो जाता है।( और पढ़ेदिमाग तेज करने के 15 सबसे शक्तिशाली उपाय)

शिरः शूलादिवज्र रस के नुकसान : Shir Shuladi Vajra Ras ke Nuksan

1-अधिक खुराक के गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं ।
2-शिरः शूलादिवज्र रस को डॉक्टर की सलाह अनुसार ,सटीक खुराक के रूप में समय की सीमित अवधि के लिए लें।
3- शिरः शूलादिवज्र रस लेने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।