नाभि मे छुपा है सेहत का राज :

जैसे गाड़ी के पहिए के नाभ पर अरे टिके रहते हैं और उन अरों पर चक्के की बाहरी परिधि, वैसे ही नाभि पर सभी नस-नाडियाँ और नस-नाडियों पर मानव शरीर की बाह्य आकृति टिकी है। नाभि शरीर का मध्यस्थ केंद्र होने से ऊपर तथा नीचे के अवयवों व अंग-उपांगों से विधिवत् जुड़ी हुई है। अधिकांश प्रमुख अवयव, ग्रंथि इत्यादि शरीर के मध्य भाग में स्थित हैं और पाचन-प्रक्रिया, मल-मूत्र विसर्जन-प्रक्रिया, रक्त की परिभ्रमण-प्रक्रिया, श्वसन-प्रक्रिया जैसी महत्त्वपूर्ण क्रियाएँ इस मध्य भाग से ही संपन्न होती हैं। अतः निर्विवाद रूप से शरीर के मध्य भाग की प्रधानता सिद्ध होती है। शरीर के मध्य भाग के बीच में यह नाभि केंद्र है।

नाभि प्राण-संचार का प्रमुख केंद्र है। यहीं पर (वैश्वानर अग्नि) जठराग्नि या प्राणाग्नि स्थित है और पाचन इत्यादि क्रियाओं को सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न करती रहती है। इस अग्नि के कारण ही भुक्तान्न से रस, रक्त, मांस इत्यादि बनाने की प्रक्रिया होती है। शुक्र-शोणित, ओज इत्यादि सूक्ष्मतम धातुओं की निर्माण-श्रृंखला संपन्न होती है। निर्माण-श्रृंखला जिस धातु पर अवरुद्ध हो जाती है, उस धातु की शरीर में वृद्धि हो जाती है;

जैसे—मांस में रुक जाने से मांस की वृद्धि शरीर में हो जाती है। मेद व हड्डी में रुक जाने से मेद व हड्डी बढ़ जाती है। इस सूक्ष्मीकृत प्रक्रिया को नाभि स्थित जठराग्नि ही संपादित करता है। इस प्रकार नाभि में दो प्रकार की क्रियाएँ होती रहती हैं

(क) अग्नि–नाभि स्थित भुक्तान्नों का सम्यक् रूप से परिपाक करके रस, रक्त, मांस, मेद, हड्डी इत्यादि सूक्ष्म धातुओं में परिवर्तित करना।
(ख) प्राणाग्नि, प्राणिक ऊर्जा–नाभि स्थित प्राण-ऊर्जा रक्त इत्यादि धातुओं का संचार पूरे शरीर में आवश्यकतानुसार संचारित कर शरीर को आवश्यक पोषक तत्त्व का वितरण करना।

इन दो क्रियाओं के ऊपर ही इस शरीर का स्वास्थ्य निर्भर करता है। इन क्रियाओं में थोड़ी भी गड़बड़ी हुई तो साध्य-असाध्य रोग भी हो जाते हैं। साथ ही मानसिक रुग्णता भी होने लगती है। इस संदर्भ में थोड़ा विशेष विचार करना आवश्यक है।
(क) समाग्नि-जब नाभि स्थित वैश्वानर अग्नि सम व संतुलित होती है, तब ही सम्यक् पाचन होता है और त्रिदोष वात, पित्त, कफ भी संतुलित अवस्था में शरीर में बने रहते हैं। वात, पित्त, कफ सम होने से रस, रक्त, मांस, मेद इत्यादि अष्ट धातुओं और मल-निष्कासन संबंधी क्रियाएँ भी सम होंगी। अब शरीर, इंद्रियों और मन में स्फूर्ति, शक्ति व प्रसन्नता होगी। तभी शरीर स्वस्थ है, ऐसा कहा जा सकता है।
स्वास्थ्य ठीक है, इस संदर्भ में आयुर्वेद में कहा गया है; यथा
समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियाः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थमित्यभिधीयते ॥
भावप्रकाश॥

स्वास्थ्य का रहस्य अग्नि के सम होने में ही है।

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(ख) कुपिताग्नि-नाभि स्थित अग्नि (जठराग्नि) के कुपित हो जाने से वात, पित्त, कफ-इन त्रिदोषों का संतुलन समाप्त हो जाता है। इन तीनों दोषों के कारण क्रमशः विषमाग्नि, तीक्ष्णाग्नि व मंदाग्नि हो जाती हैं, जिससे अष्ट धातुओं के एक-दूसरे में परिवर्तित होने की परिपाक क्रिया ठीक नहीं होती, मंद या बंद हो जाती है। जिस धातु में यह परिपाक क्रिया समाप्त हो जाती है, उस धातु की शरीर में मात्रा बढ़ जाती है, रोगोत्पत्ति होने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। मल-मूत्र, पसीना इत्यादि मल-विसर्जन की क्रियाएँ भी विषम हो जाती हैं, बिगड़ जाती हैं। इस तरह कुपिताग्नि होने से शरीर, इंद्रिय, मन के सौष्ठव-वर्धन, उत्साह, प्रसन्नता समाप्त-सी हो जाती है और भारीपन, उत्साहहीनता, आलस्य, प्रमाद इत्यादि आने लगता है। धीरे-धीरे शरीर में रोगों की उत्पत्ति होने लगती है; यथा

रोगाः सर्वेऽपि मन्दाग्नौ सुतरामुदराणि च।
अजीर्णान्मलिनैश्चान्तैः जायन्ते मलसंचयात्॥ वाग्भट्ट॥

अर्थात् निश्चय ही सभी रोगों का कारण मंदाग्नि है और इसका सीधा संबंध पेट (उदर) से है। अजीर्ण मंदाग्नि के कारण होता है और मल-संचय या विजातीय द्रव्यों के कारण मंदाग्नि होती है। इस प्रकार कुपिताग्नि से रोग उत्पन्न होते हैं। पेट के समस्त रोग उदरस्थ अग्नि के कुपित होने से होते हैं। कब्ज, गैस, आँव-पेचिश, उदर शोथ व दर्द, अम्ल-पित्त, पतला दस्त, मूत्र व वीर्य संबंधी रोग कुपिताग्नि के कारण ही होते है।

(ग) प्राणाग्नि–नाभि स्थित प्राण-शक्ति ही विद्युत् की भाँति प्राणवाहिनी स्नायुओं के माध्यम से संपूर्ण शरीर में प्रवाहित रहते हुए शरीर में संवेदना व क्रियात्मक शक्ति को बनाए रखती है, साथ ही शरीर के विभिन्न अवयवों, ग्रंथियों के कार्य में सक्रिय सहयोग करती है। जैसे बिना बिजली के विद्युत् उपकरण एवं यंत्र कार्य नहीं करता है, वैसे ही प्राण-शक्ति अर्थात् जैविक विद्युत् शक्ति के बिना शरीर के कोई भी अवयव, ग्रंथि, अंग गतिमान या क्रियाशील नहीं होता। इस प्राणिक ऊर्जा के कारण ही मनुष्य में प्रतिरोधक शक्ति होती है, जो किसी भी बाहरी रोगाणुओं से संघर्ष करके उन्हें भगाकर शरीर को स्वस्थ रखती है और शरीर में कार्य करने की विशेष क्षमता प्रदान करती है। शारीरिक क्रियाकलापों को संपन्न करने में जितनी उपयोगिता व महत्ता प्राणिक ऊर्जा की है, उससे कम इसकी उपयोगिता व महत्ता मानसिक कार्यों में नहीं है। जिस प्रकार बिजली की आपूर्ति मुख्य विद्युत् गृह से सहायक विद्युत् केंद्र, फिर उप-सहायक केंद्र के पश्चात् घरों व कारखानों को होती है, वैसे ही नाभि प्राणिक ऊर्जा का प्रधान केंद्र है। यहाँ से ही शाखा-उपशाखा रूपी केंद्रों में वितरित होकर समस्त अवयवों, ग्रंथियों और अंगों में यथावश्यकता आपूर्ति होती रहती है। प्राण-शक्ति का वितरण जाग्रतावस्था में ही नहीं, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था में भी बिना रुकावट अहर्निश होता ही रहता है। जिस अंग में इसकी आपूर्ति न हो, वह अंग सूख जाएगा, रुग्ण हो जाएगा या लकवा इत्यादि से ग्रस्त हो जाएगा। शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए नाभि-केंद्र प्रमुख रूप से उत्तरदायी है।

इस प्राणिक विद्युत् शक्ति के कारण ही जीवन-यात्रा निर्बाध गति से चल रही है। इसी के द्वारा रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र, शोणित, ओज आदि धातुओं का सम्यक् संचार व वितरण संपूर्ण शरीर में होता है। प्राण-ऊर्जा के कम होने पर इन धातुओं की परिपाक श्रृंखला प्रभावित होती है और शरीर में कमजोरी अनुभव की जाती है। शरीरगत क्रियाओं के सुसंपन्न होने के लिए प्राण- केंद्र या नाभि का सबल होना आवश्यक है। शरीर की स्फूर्ति, सक्रियता, हलकापन इत्यादि इस ऊर्जा पर ही निर्भर करता है। इस प्रकार जठराग्नि द्वारा परिपाक भुक्तान्नों को नाभि स्थित प्राण-ऊर्जा संपूर्ण शरीर में वितरण करती है। विभिन्न अवयवों के माध्यम से प्राण और रक्तादि के यथोचित संचार से शरीर शक्तिशाली व पुष्ट होता है। वितरण व्यवस्था ठीक न होने से पोषक तत्त्व का आवंटन नहीं होता और शरीर निर्बल, कृश तथा स्नायु-दौर्बल्य होने लगता है।

अतः स्वास्थ्य का घनिष्ठ संबंध नाभि केंद्र से है। स्वस्थ रहने के लिए नाभि स्थित अग्नि का सम होना और प्राण-शक्ति का पूरे शरीर में सम्यक् आवंटन होना आवश्यक है। जैसे विद्युत् शक्ति से मशीन चलती है, वैसे ही प्राण-शक्ति से इस शरीर का संचालन होता है। प्राण-शक्ति का प्रमुख केंद्र नाभि है। दूसरी बात–जन्म से पूर्व इस शरीर का पालन-पोषण, विकास, संचार इत्यादि नाभि-केंद्र से ही होता रहा है। इस शरीर के समस्त इंद्रियों, ग्रंथियों, अवयवों, अंगों-उपांगों के विकास, रक्षण, परिवर्धन का मूल स्रोत नाभि ही है और नाभि से ही इस शरीर की सृष्टि स्थित जाननी चाहिए। अंतत: इस शरीर के सम्यक् लालन-पालन, पोषण, रक्षण, विकास और स्वास्थ्य के मूल में नाभिचक्र का ही चमत्कार व रहस्य है।
नाभि से निर्गत शिरा-धमनी से ही धातुओं की पुष्टि होती है और इसके फलस्वरूप ही स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है; यथा

शिराधमन्योर्नाभिस्थाः सर्वव्याप्य तनुं स्थितः।
पुष्णन्ति चानिशं वायोः संयोगात् सर्वधातुभिः ॥

शाङ्गधर पू. 5, 43

अर्थात् नाभि स्थित सभी शिराएँ व धमनियाँ समूचे शरीर में व्याप्त होकर वायु के संयोग से सर्वधातु पोषक रसों का वहन करती हुई शरीर को पुष्ट करती हैं।