होली का आगमन इस बात का सूचक है कि अब जीवन में बहार ही बहार है। क्योंकि यह पर्व शिशिर ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु के आगमन का सूचक है। इस बीच ऋतुओं के राजा वसंत का आगमन हो चुका होता है, जो प्रकृति और जीवन में उल्लास भर रहा होता है। इसके आते ही खेतों के फल पक जाते हैं, सरसों खिली होती हैं, जिन्हें देखकर किसान का मुग्ध होना स्वाभाविक है, यह परिश्रम का फल जो है। इस ऋतु में पेड़ों पर नए पत्ते आ जाते हैं। इसी ऋतुराज वसंत की फाल्गुनी पूर्णिमा पर होली का आगमन होता है।

होली शब्द होला से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ अन्न, नई और अच्छी फसल से है। वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था, जिसमें खेत के अधपके अन्न के दानों को यज्ञ में आहुति देकर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने का विधान था। नई-नई फसल का नवान्न अर्थात् गेहूँ की जो बालियाँ अग्नि में जलाई जाती है, उसमें उसका बाहरी हिस्सा जल जाता है, भीतर का अन्न बच जाता है, यही प्रह्लाद है और जो बाहर की बालियाँ जल जाती हैं, वही होलिका है।

यह रंगों का त्योहार दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन होलिका जलाई जाती है। इसे होलिका दहन भी कहते हैं। यह अग्निपूजा है और इसका संबंध कृषि से है। दूसरे दिन खेले जानेवाले रंग का संबंध सीधे वसंत से है, क्योंकि प्रकृति भी इस समय रंगीन होती हैं। वसंत उल्लास से भरा होता है, इसलिए यह उल्लास मस्ती का त्योहार है। इस तरह से यह त्योहार वसंत का संदेशवाहक हुआ। यह राग-रंग का त्योहार है, क्योंकि प्रकृति भी अपने पूरे यौवन पर होती है। संगीत में नाचती-गाती, रंग बिखेरती तो लोग भी लोकगीत के साथ ढोलक की ताल पर नाचतेगाते हैं। और क्यों न गाएँ, इस वक्त पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी उल्लास में होते हैं। यह प्रेम और संबंधों का त्योहार है। यह सभी आडंबर को तोड़नेवाला उत्सव है। होली का एक पक्ष सांस्कृतिक तो एक पक्ष कलात्मक भी है। होली संगीत और साहित्य से भी जुड़ी हुई है। रंगों की तरह ही इसके अनेक रूप/पक्ष हैं।

होली पर्व मनाने के पीछे अनेक पौराणिक कथाएँ और ऐतिहासिक घटनाएँ भी जुड़ी हैं। जिसमें प्रह्लाद और होलिका की कथा सर्वाधिक लोकप्रिय है। भक्त प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशपु नास्तिक
और अधर्मी थे। उनके कहने पर ही उनकी बहन होलिका प्रह्लाद को लेकर आग में बैठ गई, जिसमें होलिका तो जलकर राख हो गई और प्रह्लाद बच गया। बाद में भगवान् विष्णु ने नृसिंह का अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का वध किया। उसी समय से होलिका दहन और होलिकोत्सव मनाया जाता है। इस तरह से होली अधर्म के ऊपर धर्म, बुराई के ऊपर भलाई, दानत्व के ऊपर देवत्व की विजय का पर्व है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाचगाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करके उनका आचरण करते हैं। भौतिकता से दूर अपने मूल रूप में, मदमस्त, मिट्टी के शरीर का मिट्टी के साथ खेलना। यह भी एक तरह का वैराग्य भाव ही है।

एक लोककथा में श्रीकृष्ण ने दुष्टों का दलन कर गोप-बालाओं के साथ रास रचाया, तब से होली का प्रचलन है। एक कथा यह भी प्रचलित है कि जिस दिन श्रीकृष्ण ने पूतना राक्षसी का वध किया, उसी हर्ष में गोकुलवासियों ने रंग खेलने का उत्सव मनाया। वैदिक काल से इस पर्व की परंपरा रही हैं। बस इसका स्वरूप बदलता रहा। यह आर्यों द्वारा हर युग में मनाया गया।

पूरे भारतवर्ष में ब्रज की होली सबसे अधिक मशहूर है। ब्रजक्षेत्र में होली मनाने के पीछे राधाकृष्ण का दिव्य प्रेम है। ब्रज की होली के साथ बरसाने की लठमार होली भारत में आकर्षण का केंद्र है। इसके पीछे कई सामाजिक संदेश है, जिसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों और कपड़ों के कोड़े से मारती हैं। कुमाऊँ की होली का अपना रंग है तो बंगाल की होली का अपना रूप। और पंजाब के होला-मोहल्ला का अपना ही स्वरूप है। बिहार का फगुआ, छत्तीसगढ़ की होरी से लेकर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु से लेकर नेपाल तक होली में अनेक विविधता है। दक्षिण में इसे भगवान् शिव का ध्यान भंग करनेवाले कामदेव के बलिदान को लेकर मनाया जाता है।

मनुष्य का आधुनिक जीवन अनेक कष्टों और विपदाओं से भरा हुआ है। वह दिन-रात अपने जीवन की पीड़ा को दूर करने में प्रयासरत रहता है। इसी आशा-निराशा के क्षणों के बीच होली जैसा पर्व उसके जीवन में उत्साह और उल्लास का संचार कर देता है। | ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता भूलकर फिर से गले मिलते हैं। एकदूसरे को रंग लगाते ही सारे गिले-शिकवे दूर हो जाते हैं। सुबह रंग खेलकर शाम को कपड़े बदलकर एक-दूसरे के घर मिलने जाते हैं। मिष्टान्न और स्वादिष्ठ पकवान खाए और खिलाए जाते हैं। इसमें बच्चे, बूढ़े सभी बराबरी से मस्ती और आनंद लेते हैं। इस दिन रंग गुलाल, गोष्ठी, परिहास, गायन, वादन और जलक्रीड़ा के साथ धमाल किया जाता है। यह है सनातन परंपरा है। आज अगर इसका रूप विकृत हुआ है तो बाजार के रंग और हमारी मानसिकता से। कीचड़ में खेलना उत्तम है, क्योंकि हमारा शरीर मिट्टी का ही है, लेकिन हमारा कीचड़ बन जाना हमारे अंदर की पशुता है।

मानवीय मस्ती और प्राकृतिक आनंद का शरीर और मन-मस्तिष्क पर अनुकूल और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। चूंकि ये सर्दी के मौसम के अंत में मनाया जाता है तो आलस से भरे शरीर में इस त्योहार से अतिरिक्त ऊर्जा मिलती है। शिथिल शरीर सक्रिय हो जाता है। एक रात पूर्व जलाई गई होलिका से भी शरीर को उष्णता मिलती है। यह पर्व संबंधों को पुनः जीवंत करने, उन्हें और सुदृढ़ बनाने में मदद करता है। यह होली के द्वारा सनातन संस्कृति की समाज को देन है।