दारु हल्दी का सामान्य परिचय : Daru Haldi in Hindi

दारु हल्दी का वृक्ष कांटेदार और झाड़ीनुमा होता है। इसकी ऊँचाई १५ फीट तक होती है। हिमालय में नेपाल, धून ओर कुनुवार में यह वृक्ष बहुत पैदा होता है । हिमालय में पैदा होने वाली दारुहल्दी की छह जातियाँ होती हैं। जिनको लेटिन में क्रम से, बरबेरिस एरिस्टेटा, बरबेरिस एसियाटिका, बरबेरिस कोर्सिया, बरबेरिस लिसियम, बरबेरिस नेपलेसिन्स और बरबेरिस व्हलगेरियस कहते हैं। इन्हीं को क्रम से हिन्दी में दारु हल्दी, किलमोरा, कमल, चित्रा, चिरोर और झरके कहते हैं ।

कष्मल नामक जाति राजपुर से मसूरी तक और नान से चूर पर्वत पर साधारण ऊँचाई पर पैदा होती है । इसके पत्ते और डालियाँ फीके रंग की होती हैं। इसमें कांटे बहुत होते हैं । अप्रैल महीने में इसके फूलों के झुमके आते हैं। इसके फल अधिक मांसल नहीं होते । गढ़वाल और सिर मौर में इस वृक्ष के द्वारा रसौत तैय्यार की जाती है ।

इसकी चित्रा नामक जाति का वृक्ष कमल की अपेक्षा अधिक ऊँचाई पर पैदा होता है । इसकी डालियाँ खाकी रंग की, पत्ते अखंड और फूल कमल के फूलों की अपेक्षा बड़े आकार के होते हैं । ये भी झुमकों में लगते हैं। इसके फल विशेष मांसल होते हैं और वे सुखाये जाने पर काली द्राक्ष के समान दिखलाई देते हैं । ये फल बाजार में जरेशन के नाम से बिकते हैं। इनके बीजों का स्वाद कुछ खट्टापन लिये हुए स्वादिष्ट होता है । नेपाल के अन्दर इस वनस्पति के पंचांग को उबालकर रसोत तैयार की जाती है। दारुहल्दी की एक जाति नीलगिरी पर्वत पर भी होती है, मगर उत्तम जाति की दारुहल्दी उत्तर हिन्दुस्तान से ही सब दूर जाती है।

इसकी उत्पत्ति कम होने की वजह से गन्धी लोग इसके बदले में विधायरा और समुद्र शोष की लकड़ियों को हलदी में उबाल २ कर देते हैं । इसलिये दारु हलदी को खरीदते समय उसकी असलियत का ध्यान रखना चाहिये । दारू हलदी के टुकड़े मुड़ नहीं सकते और न चोट मारने से आसानी से टूटते हैं। इसकी लकड़ी अत्यन्त चीठी और कठिनाई से टूटने वाली होती है । टूटने पर इसकी बुकनी हलदी की बुकनी की तरह दिखलाई पड़ती है । इस लकड़ी को चाहे कितना ही उबाला जाय पर इसका पीलापन दूर नहीं होता ।

विभिन्न भाषाओं में नाम :

संस्कृत-दारु हरिद्र, दारु पित्ता, दारुनिशा, दर्वी, द्वितीया, अभा, हेमवती, हरिद्र, हेम कांति, कामिनि, कष्ठा, पीतदारु, पीत चन्दना इत्यादि । हिन्दी–दारु हलदी, कष्मल । नेपाल-चित्रा, कप्मल । गुजराती-दारुहल्दर । मराठी–दारुहलद । कुमाऊँ-किल मोरा । कनाडी-मरदर्शिना । बंगाल दारुहरिद्रा । लेटिन-Berberis Aristata (बरबेरिस एरिस्टेटा)।

दारु हल्दी के औषधीय गुण :

आयुर्वेदिक मत –

आयुर्वेदिक मत से दारू हल्दी कड़वी, चरपरी, गरम तथा व्रण, प्रमेह, कन्डू, विसर्प, त्वचा के दोष, विषविकार, कर्णरोग, नेत्ररोग, मुखरोग, गर्भाशय के रोग और ज्वर में गुणकारी है।

यूनानी मत –

•यूनानी मत से यह पीलिया, आँखों के व्रण, दांत के दर्द और दमे पर लाभदायक है।
•अच्छे नहीं होने वाले व्रणों को भी यह सुखा देती है ।
• इसका लेप प्रदाह और सूजन को मिटाता है ।
•मलयागिरि चन्दन के साथ इसका उपयोग करने से धातु का जाना बन्द हो जाता है।
• टूटी हुई हड्डी पर अण्डे की सफेदी के साथ इसका उपयोग करने से हड्डी जुड़ जाती है ।
•चोट की जगह पर इसका लेप करने से खून नहीं जमता ।
• शक्कर के साथ इसको खाने से स्तम्भन होता है ।
• खराब नासूर भी इसके उपयोग से भर जाता है ।
• तर और सूखी खुजली, जहर बाद और पेट के कीड़े भी इसके उपयोग से नष्ट हो जाते हैं।

रासायनिक विश्लेषण :

दारू हल्दी के अन्दर प्रधान वस्तु इसके अन्दर पाया जाने वाला बरबेराइन नामक पीले रंग का कड़वा उपक्षार होता है। इसी द्रव्य की वजह से इस औषधि की इतनी प्रशंसा है । यह इसकी जड़ और छिलके में काफी फैला हुआ रहता है।

औषधि शास्त्र में बरबेराइन की उपयोगिता-

✦बरबेराइन विषैला उपक्षार नहीं है। इसका सब कुटेनियस इंजेक्शन दिये जाने पर यह शरीर की क्रिया में जल्दी ही मिल जाता है । मुँह से दिये जाने पर इसका रंग बहुत जल्दी पेशाब के अन्दर दिखलाई देने लगता है।
✦बरबेराइन पाकस्थली और बड़ी आंत की गति पर अपना उत्तेजक प्रभाव दिखलाता है ।
✦हृदय के ऊपर भी इस उपचार के काफी प्रभाव होते हैं। इसके देने से हृदय का भार कम हो जाता है । रक्त की नलियों का फैलाव होता है । हृदय की शांरिकल्स और वेन्ट्रिकल्स में ढीलापन आता है और इसका। प्रभाव हृदय के विस्तार में होता है।
✦श्वासक्रिया प्रणाली पर बरबेराइन का प्रभाव-इसके देने से श्वास क्रिया प्रणाली पर भी प्रभाव पड़ता है । सम्भव है कि यह रक्त भार कम होने के कारण से ही होता हो । जब इसे अधिक मात्रा में दे दिया जाता है तब शुरू-शुरू में इस से उत्तेजना होती है। लेकिन बाद में श्वास के केन्द्र ढीले हो जाते हैं जिससे श्वास रुक जाने की वजह से कभी-कभी मृत्यु भी हो जाती है।
✦बरबेराइन और चर्मरोग-बरबेराइन का सब से अधिक उपयोग ओरियन्टल सोअर याने पूर्वी देश के फोडों पर किया जाता है । जाली ने सन् १९११ में सब से पहले रसोत को इस उपयोग में लिया और उसके परिणाम भिन्न २ नजर आये । सन् १९२७ में वर्मा ने बरबेराइन सल्फेट को ओरियण्टल सोअर के उपयोग में लिया और उनको काफी सफलता प्राप्त हुई । उसी वर्ष कर्मचन्दानी ने इन फोड़ों पर अनेक प्रकार से बरबेराइन को अजमाया और उन्होंने बतलाया कि बरबेराइन के इंजेक्शन इन फोड़ों को दूर करने में बहुत सफल सिद्ध हुए हैं। दास गुप्त और दीक्षित ने सन् १९२९ में बरबेराइन को इन फोड़ों से पीड़ित बीमारों पर और चूहों के जख्मों पर अजमाया और वे इस नतीजे पर पहुँचे कि इस विकार को नष्ट करने में इस बनस्पति का काफी प्रभाव है । इसी वर्ष लक्ष्मी देवी ने भी पूर्वीय फोड़ों से पीड़ित कई बीमारों पर इसको अजमाया जिसमें उन्हें काफी सफलता मिली। इन सब अनुसन्धानों से सिद्ध हो चुका है कि ऐसे चर्म रोगों में, जिनमें जखम हो जाते हैं, बरबे रिन सलफाइड बहुत सफल उपाय है ।
इसका एक सप्ताह में एक ही इंजेक्शन देना काफी होता है। पूरी बीमारी को दूर करने के लिये तीन से अधिक इंजेक्शनों की आवश्यकता नहीं होती । फोड़ों का साधारण ड्रेसिंग करते रहना चाहिये |
नोट- मेसर्स मे एण्ड बेकर ने ओरिसोल के नाम से बराबर इनके पेटेण्ट इन्जेक्शन्स तैयार किये हैं।

रसोत (दारू हलदी का क्वाथ) बनाने की विधि :

वर्षा के आखिर में दारू हल्दी के झाड़ को काट कर, उसके पंचांग को कूट कर । उसका घन क्वाथ बना लिया जाता है उसको रसोत कहते हैं। कहीं-कहीं इसकी जड़ों को ४ तोला लेकर उनके पतले २ टुकड़े करके उनको आधा सेर पानी में उबालते हैं और जब ८ तोला पानी रह जाता है, तब इसमें ८ तोला बकरी का दूध मिलाकर फिर उबालते हैं और गाढ़ा होने पर ठण्डा कर लेते हैं। यही रसोत कहलाता है। बाजारू रसोत में लकड़ी, पानी, लाल मिट्टी, वगैरह कचरा मिला हुआ रहता है । इस लिए इसको शुद्ध किये बिना काम में नहीं लेना चाहिये । इस रसोत को दसमुने गरम पानी में मिला कर कपड़े में छानना चाहिये और फिर उसको सुखकर काम में लेना चाहिये ।

दारु हल्दी के फायदे : benefits of daru haldi in hindi

1-रसोत(दारू हलदी का क्वाथ) यह एक मूल्यवान औषधि है । ज्वर के अन्दर इस औषधि को देने का बहुत रिवाज है । विषम ज्वर को उतारने के लिए रसोत को १५ रत्ती की मात्रा में ठण्डे पानी में मिलाकर दिन में तीन बार देना चाहिये । इससे पेट में कुछ गरमी उत्पन्न होती हुई मालूम होती है, भूख लगती है, अन्न पचता है और दस्त साफ होता है। विषम ज्वर में सब प्रकार से यह लाभ पहुँचाती है और प्लीहा को दुरुस्त करती है । कुनेन से जिस प्रकार सिर दर्द, बहिरापन और कब्ज हो जाती है वैसी इससे नहीं होती । मगर इसमें एक दोष भी है, वह यह कि अगर रोगी को रोग के पूर्व कभी रक्त आंव की शिकायत हुई हो तो वह फिर से पैदा हो जाती है । विषम ज्वर की चिकित्सा में रसोत को देने के पूर्व रोगी को जुलाब देना चाहिये और खाली पेट इसकी पूरी मात्रा देना चाहिये। उसके पश्चात् रोगी को अच्छी तरह से ओढ़ाकर सुला देना चाहिये । कभी-कभी रोगी को बहुत प्यास लगती है और उसका जी घबराने लगता है मगर उसको पानी नहीं देना चाहिये । १ घण्टे के बाद रोगी को पसीना छूटने लगता है और उसको कमजोरी आने लगती है । उस समय रोगी को थोड़ा दूध पीने को देना चाहिये । इसके बाद रोगी अक्सर सो जाता है। और सोकर उठने के बाद उसकी तबियत अच्छी हो जाती है।

2-चालू ज्वर के अन्दर अगर पित्त की प्रधानता हो और रोगी को जंभाइयाँ, दस्त, उल्टी, सिर दर्द और थकावट मालूम होती हो तो ऐसे समय में दारुहल्दी का क्वाथ बनाकर देना चाहिये । ज्वर के साथ यदि कब्जियत हो तो दारुहल्दी को चिरायते के साथ देना चाहिये ।

3-ज्वर के अनन्तर होने वाली कमजोरी में दारुहल्दी से बड़ा लाभ होता है । मलेरिया के विष से अथवा आमाशय की शिथिलता से होने वाले अग्निमांद्य में अथवा आंतों के रोम में दारूहल्दी का क्वाथ देने से आमाशय की वृद्धि होकर आंतों की शक्ति बढ़ती है । इन रोगों में दारूहल्दी को छोटी मात्रा में सुगन्धित द्रव्यों के साथ देना चाहिए ।

डॉक्टर ओशगनेसी ने बुखार के करीब ३६ रोगियों पर रसोत को अजमाया । इनमें से कई के तिल्ली की तकलीफ भी थी । रसोत शुरू करने के बाद तीन दिन में बुखार मिट गया । चौथैया ज्वर से पीड़ित ८ बीमारों पर इसे अजमाया गया, जिसमें से ६ बीमार अच्छे हो गये । उन्हें सिर दर्द और कब्जियत भी नहीं हुई ।

4-इसको कपूर और मक्खन के साथ में मिला कर एक मलहम तैयार की जाती है । इस मलहम को फोड़े-फुन्सियों पर लगाने से बड़ा लाभ होता है।

5-बोस और कीर्तिकर के मतानुसार रसोत आधे ड्राम की मात्रा में पानी के साथ ज्वर, दूर करने के काम मे दी जाती है । इसको दिन में तीन बार देते हैं। इससे कुछ गरमी भी मालूम पड़ती है, भूख बढ़ती है पाचन क्रिया दुरुस्त होती है और दस्त साफ हो जाता है।

6-सन्याल और घोष के मतानुसार रसोत को अफीम, फिटकरी और जल के साथ पीसकर आँखों पर लेप करने से आँखों का दुखना बन्द हो जाता है। इसको दूध के साथ मिलाकर आँखों में टपकाने से भी आँखें अच्छी हो जाती हैं । प्रदाहिक सूजन पर भी रसोत को अफीम, सेन्धा नमक और पानी के साथ पीसकर लेप करने से शांति मिलती है ।

7-अतः प्रयोग में इसकी लकड़ी और इसकी जड़ का छिलका, एक उत्तम कटु पौष्टिक और ज्वर निवारक वस्तु है। इसे दूसरे कड़वे और सुगन्धित पदार्थों के साथ में ज्वर उतारने के लिये देते हैं। इसके परिणाम हमेशा ही लाभदायक सिद्ध हुए हैं। पित्त की विशेषता होने पर यह विशेष लाभदायक होता है ।
इसकी जड़ का छिलका पौष्टिक, पसीना लाने वाला और ज्वर निवारक है। ज्वर दूर करने के लिए कुनेन और सिनकोना से इसमें कुछ अच्छाइयां भी हैं। कुनेने के अधिक सेवन से रोगी की श्रवण-शक्ति कमजोर हो जाती है, वह इससे नहीं होती । कुनेन चढ़े हुए ज्वर में नहीं दी जाती, मगर यह ‘चढ़े हुए ज्वर में भी दिया जा सकती है। यह अत्यधिक रजःस्राव में भी काम में लिया जाता है और इसके परिणाम सन्तोषजनक होते हैं।

9-हब्स बूलर के मतानुसार इसके पत्ते बलूचिस्तान में पीलिया की बीमारी में काम में लिये जाते हैं।
खूनी बवासीर के ऊपर भी रसोत बाह्य और अन्तःप्रयोग, दोनों कामों में ली जाती है और उससे अच्छा फायदा होता है । बवासोर को दूर करने के लिए रसोत, निम्बोली की सगज और मुनक्का के साथ गोली बनाकर दी जाती है और उससे अच्छा लाभ होता है । इसके साथ ही रसोत को मक्खन के साथ मिलाकर बवासीर पर सगाई भी जाती है ।

10-तीव्र नैत्राभिष्यंद रोग में इसको फिटकरी और मक्खन के साथ मिलकर आंखों के ऊपर लेप करते हैं।

11-शारीरिक स्राव और मल की अधिकता होने पर दारूहल्दी को देने का बहुत रिवाज है। इससे श्लेष्मा और पीब की कमी होती है। त्वचा के अन्दर की रस ग्रन्थि की विनिमय क्रिया दारुहल्दी को देने से सुधरती है।

इस कारण उपदंश, गण्डमाला, नासूर, भगन्दर, व्रण और विसर्प रोगों में इसको खिलाने से और इसका लेप करने से अच्छा लाभ होता है। प्रदर और गर्भाशय की शिथिलता से होने वाले आत्यार्तव में इसको उपयुक्त अनुपान के साथ देने से लाभ होता है ।

12-दारू हल्दी से पेशाब की शुद्धि भी होती है। इसलिये वस्थिशोथ में दारू हल्दी को आंवले के साथ देना चाहिये ।

13-सूजन पर रसोत का लेप करने से सूजन मिट जाती है। कण्ठमाला पर रसोत और कपूर को मक्खन के साथ मिलाकर लगाने से फायदा होता है। जख्म के ऊपर रसोत का लेप करने से जखम जल्दी भर जाता है। नेत्रभिष्यन्द में इसका लेप आंखों पर करने से आंखों की सूजन उतर आती है। मुख रोगों में दारू हल्दी के क्वाथ के कुल्ले करने से लाभ होता है । खुनी बवासीर में पांच रत्ती रसौत को ५ रत्ती नीम के बीजों के साथ मिलाकर मक्खन में मिलाकर देने से और १ ड्राम रस्रोत को ३ औंस पानी में मिलाकर उससे बबासीर को धोने से अच्छा। लाभ होता है।

14-साँप और बिच्छू के विष को दूर करने के लिये भी इस औषधि की अच्छी तारीफ है । मगर केस और महस्कर के मतानुसार इस वनस्पति की जड़, गोंद, शाखाएं इत्यादि सभी अंग सांप और बिच्छू के विष पर बिल्कुल निरुपयोगी हैं। ।

15-डॉक्टर देसाई के मतानुसार दारूहल्दी कड़वी, उष्ण, कटुपौष्टिक, पार्यायिक ज्वर को दूर करने वाली, पसीना लाने वाली, कफनाशक और चर्म रोगों को दूर करने वाली है। इससे बनाया जाने वाला रसोत, सूजन को दूर करने वाला, कफनाशक, पार्यायिक ज्वर को दूर करने वाला ज्वरनाशक होता है।

16-इसका फल जरेशक, शीतल, खट्टे और रोचक होता है। छोटी मात्रा में दारू हल्दी कटुपौष्टिक, दीपक और सौम्यग्राही होती है। इसका कटुपौष्टिक धर्म, कलम्ब की जड़ और कन्डू [ Gentiana Kursoa ] के समान होता है। बड़ी मात्रा में यह एक जोरदार पसीना लाने वाली और उत्तम ज्वरनाशक औषधि हो जाती है। मात्रा और अधिक होने से इससे पेट में मरोड़ी चलकर दस्त होने लगते हैं। इसका ज्वरनाशक धर्म सिनकोना के धर्म समान है। मगर सिनकोना से होने वाली प्रतिक्रियाएं इससे नहीं होतीं । मलेरिया ज्वर को दूर करने के लिये यह औषधि कुनेन की अपेक्षा हलके दर्जे की है । जीर्ण ज्वर में बढ़ी हुई तिल्ली को यह कुनेन के समान ही संकुचित करती है । इसमें पाया जाने वाला बरबेराइन नामक पीला तत्त्व पेशाब की त्वचा के रास्ते से बाहर निकलता है। पेशाब के मार्ग से बाहर निकलते समय यह पेशाब का रंग पीला कर देता है और मूत्र पिंड की सूजन या दूसरी बीमारियों को मिटा देता है । त्वचा के रास्ते बाहर निकलते समय त्वचा की विनिमय क्रिया को सुधार देता है ।

17-चक्रदत्त के मतानुसार इसकी छाल का ताजा रस शहद के साथ प्रातःकाल लेने से पीलिया की बीमारी में लाभ होता है ।

दारू हलदी के औषधीय उपयोग / नुस्खे :

1-ज्वर-
दारू हल्दी की जड़ १५ तोला, १ सेर पानी में डाल कर उबालें। जब आधा सेर पानी रह जाय तब इसको छानकर १ औंस से २ औंस की मात्रा में देने से ज्वर में लाभ होता है ।

2-बवासीर-
रसोत ५ ग्रेन, नीम की फलों की गिरी २ ग्रेन, मुनक्का १० ग्रेन । इन तीनों की तीन गोलियां बना लें । इन गोलियों को सोते वक्त लेने से बवासीर में लाभ होता है ।

3-गठिया-
इसकी डालियों को औटाकर उनका काढ़ा पिलाने से पसीना और दस्त होकर गठिया में लाभ होता है ।वायु का दर्द-इसकी जड़ की छाल का गुड़ के साथ काढ़ा बनाकर पिलाने से पेट में होनेवाली वायु का का दर्द मिट जाता है।

4-दस्त-
दारुहल्दी की जड़ की छाल और सोंठ समान भाग लेकर पीसकर दिन में २ से ३ बार लेने से दस्त बन्द हो जाते हैं।

5-दांतों का दर्द-
इसके फल का काढ़ा बनाकर उससे कुल्ले करने से दांतों और मसूड़ों का दर्द जाता रहता है और मसूड़े मजबूत होते हैं।

6-ज्वर-
ज्वर को रोकने और उतारने में यह कुनेन के बराबर है। इसकी जड़ की लकड़ी के उपयोग से सूजन वाला बुखार उतर जाता है। इसका ढाई तोला काढ़ा दो – तीन घण्टे के फासले से बुखार की बारी के दिन देने से बहुत पसीना होकर बुखार छुट जाता है । खराब हवा या जंगली हवा से होने वाले बुखार में अगर कुनेन और असेनिक के प्रयोग से भी लाभ नहीं हुआ हो तो इसका प्रयोग करके देखना चाहिये । तिल्ली और यकृत के बढ़ जाने में भी इसका काढ़ा फायदा पहुँचाता है। इसको बनाने की विधि प्रयोग नम्बर १ में लिखी गई है।

7-पीलिया-
इसके काढ़े में शहद मिलाकर पिलाने से पीलिया में लाभ होता है।

8-अण्ड वृद्धि–
इसके काढ़े में गौमूत्र मिलाकर पिलाने से अण्डवृद्धि मिट जाती है।

नोट :- ऊपर बताये गए उपाय और नुस्खे आपकी जानकारी के लिए है। कोई भी उपाय और दवा प्रयोग करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह जरुर ले और उपचार का तरीका विस्तार में जाने।