रोग परिचय : enlarged liver

लिवर(यकृत) के प्रदाह के बाद उसके परिणाम स्वरूप यकृत में बार-बार रक्त-संचार होते रहने के कारण लिवर(यकृत) का पुराना प्रदाह होकर उसकी वृद्धि हो जाती है।

लीवर का बढ़ना व सूजन के कारण : liver badhne ke karan

अधिक मसालेदार पदार्थों के खाने से, अति मद्यपान सेवन से, अति उष्णता से, अधिक ऐश-ओ-आराम से जीवन बिताने से, पित्त की अधिकता हो जाने से यह रोग हो जाता है।

लीवर का बढ़ना व सूजन के लक्षण : liver badhne ke lakshan

1- इस रोग में पेट में दाँयी तरफ भारी-भारी सा लगता है तथा रह-रह कर तीर चुभने जैसा दर्द होता है,
2- भूख की कमी, अफारा, बदहजमी, आँखें पीली हो जाना, जीभ पर लेप सा चढ़ा होना तथा मुँह का स्वाद तीता हो जाना आदि लक्षण होते हैं।
3- रोगी की आंतें अपना कार्य सुचारू रूप से नहीं कर पाती हैं, फल-स्वरूप जिगर के रोगी को कब्ज अवश्य बना रहता है। 4-कभी-कभी पतले दस्त आते हैं तथा रोगी को कभी-कभी बुखार भी हो जाता है।
5- रोगी को लिटाकर हाथ की उंगलियों से सबसे नीचे वाली पसली के बराबर जिगर को दबाने से यदि कड़ापन मालूम हो तथा रोगी को वहाँ दर्द महसूस हो तो आप निश्चित समझ लें कि रोगी का जिगर बढ़ा हुआ है।
6- यदि लिवर(यकृत) नीचे की ओर बढ़ता है तो पंजरे की हड्डी के नीचे हाथ से दवाने पर पता लग जाता है। यदि यकृत ऊपर की ओर बढ़ता है तो कन्धे की हड्डी में दर्द होता है खाँसी आने लगती है तथा साँस लेने में तकलीफ होती है।
7- बच्चों में भी दाहिनी पर्शकाओं के नीचे बढ़ा हुआ यकृत वहाँ स्पर्श कर दबाने से स्पष्ट प्रतीत होता है तथा ऐसा करते ही बच्चा दर्द से रोने भी लगता है।
8- बच्चे को कभी वमन, कभी पतले दस्त, कब्ज तथा कभी आन्त्र में कृमि (चुरने) होने से पाखाने में चुरने निकलते है। 9-बच्चा हमेशा चिड़चिड़ा रहता है।
10- आमाशय आन्त्र ही नहीं, वरन समस्त शरीर में जलन होने के कारण बच्चा ठन्डे फर्श पर लोट-पोट करता रहता है।
11- हल्का-हल्का ज्वर रहता है, अच्छी नींद नहीं आती है, सिर दर्द, जीभ मलीन, रक्त अल्पता, मन्दाग्नि, मुखाकृति पर हल्का पीला या सफेद रंग दीख पड़ता है।
12- मूत्र थोड़ा लाल तथा पीला सा मिला हुआ आता है तथा किसी-किसी बच्चे को मूत्र थोड़ी ही देर में जम सा जाता है।
13- बच्चे के दाहिने स्कन्ध में पीड़ा होती है, जिसे बड़े बच्चे तो बतला देते हैं किन्तु न बोल सकने वाले बच्चों के स्कन्ध को छूने से दर्द होने पर वह रोने लगता है।
14- मुँह का स्वाद साबुन खाये हुए जैसा लगता है।
15- बच्चों की पलकों एवं मुँह पर सूजन आ जाती है,
16- अफारा, भूख की कमी के कारण दूध भी नहीं पी पाता है। फलस्वरूप वह प्रतिदिन दुर्बल एवं क्षीण तथा कृश होता चला जाता है। इस यकृत शोथ (HEPALITIS) भी कहते है।
नोट: इस रोग का ठीक प्रकार से यदि इलाज न किया गया तो यकृद्धाल्युदर (लिवर सिरोसिस) जिगर में फोड़ा और कामला आदि रोग होने का डर रहता है। आइये जाने लिवर बढ़ जाने पर खान-पान संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी

आहार-विहार : liver badhne par kya khana aur kya nahi khana chahiye

रोग के मूल कारणों को दूर कर, नियमित आहार-विहार का और स्वास्थ्य के नियमों का कठोरता से पालन करने का निर्देश दें।
1- कब्ज न होने दें। मल त्यागन प्रतिदिन होना चाहिए, यदि ऐसा न हो तो मृदु विरेचन दें।
2- रोगी को दीपन, पाचन, रोचक आदि और यकृत विकार नाशक औषधियाँ दें।
3- खुली हवा में टहलें । खाने में दूध दे सकते हैं। जिन्हें दूध हजम नहीं होता हो, उन्हें अरारोट, बार्ली आदि दूध में दें।
4- पके फल तथा हरी शाक सब्जी दें।
5- शुद्ध जल ज्यादा पिलायें। कच्चे पपीते की तरकारी और पका पपीता दें।
6- नियमित पपीते का दूध बताशे के साथ देना उपयोगी है।
7- गरिष्ठ भोजन, भुनी-तली चीजें, गर्म खीर, मांस-मछली, दिन में अधिक सोना, परिश्रम करना, रात्रि-जागरण, नशीले पदार्थों का सेवन आदि न करें।
9- पुराने रोग में प्रतिदिन व्यायाम तथा स्नान करायें।

नोट :- याद रखे कि लिवर(यकृत) वृद्धि में दी जाने वाली औषधियाँ प्लीहा वृद्धि (तिल्ली/SPLEEN) में भी लाभ पहुँचाती है।

लीवर बढ़ने का घरेलू इलाज : liver badhne ka gharelu ilaj

1- ताप्यादि लौह 30 से 120 मि.ग्रा. बच्चों को सुबह शाम दूध से खिलायें। यकृत वृद्धि में लाभप्रद है। ताजा गोमूत्र जो कुमारी बाछी (बछिया) का हो आयु के अनुसार बच्चों को 5 से 15 बूंद गौ दुग्ध से सुबह शाम पिलायें। यकृत वृद्धि नाशक है।  ( और पढ़ेलिवर की बीमारी व सूजन के रामबाण नुस्खे )

2-कच्ची पपई (पपीता); अन्ड खरबूजा) का दूध 2 चम्मच तथा इतना ही शहद दोनों को मिलाकर आपस में खूब फेटें, तत्पश्चात् इसमें उबाला हुआ गरम जल दुगुनी मात्रा में धीरे-धीरे मिलायें और ठन्डा हो जाने पर रोगी को पिलायें। इस योग का लगातार सात दिन प्रयोग करने से प्लीहा वृद्धि में लाभ होता है।

3-करेला के रस में थोड़ा सा नमक व राई का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से प्लीहा-वृद्धि में लाभ होता है। ( और पढ़ेलिवर की कमजोरी दूर करने के लिए लिवर टोनिक सिरप )

4- कच्चे पपीते का ताजा दूध 5 बूंद तथा एक पका केला दोनों को फेंटकर भोजन के बाद दोनों समय सेवन करने से यकृत व प्लीहा वृद्धि में लाभ होता है।

5- अनार के छाया-शुष्क पत्ते 5 भाग तथा नवसादर 1 भाग दोनों को महीन पीस लें। इसे 3-3 ग्राम सुबह-शाम ताजे जल से सेवन कराने से प्लीहा वृद्धि में लाभ होता है। ( और पढ़ेअनार के 118 चमत्कारिक फायदे)

6-करील की कोपलों का चूर्ण 10 ग्राम तथा काली मिरच 6 ग्राम दोनों को एकत्रकर खरल करें, तब 4 मात्राएँ बनायें, इसकी 1-1 मात्रा जल के साथ लेने (प्रात:सायं) कुछ दिनों में ही प्लीहा वृद्धि में लाभ होता है।

7-तम्बाकू के पत्तों को नीबू के रस में पीसकर लेप करने से प्लीहा-वृद्धि में लाभ होता है।

8-पलाश के पत्तों पर तैल चुपड़कर प्लीहा पर बाँधने से उसकी वृद्धि दूर हो जाती है। ( और पढ़ेपलाश के दिव्य औषधीय प्रयोग)

9- प्याज को आग में पकाकर उसे रात भर ओस में रखकर प्रात:काल प्रतिदिन खिलाने से प्लीहा वृद्धि में शीघ्र लाभ होता है।

10-भांगरे के स्वरस में थोड़ा सा अजवायन चूर्ण मिलाकर पिलाने से यकृत वृद्धि में लाभ होता है।

11-यकृत तथा प्लीहा की सूजन पर मकोय या पुनर्नवा का स्वरस गरम करके लेप करने से यकृत तथा प्लीहा का शोथ नष्ट होता है।

12- शंख भस्म 2 ग्राम रोगी को खिलाकर ऊपर से मट्ठा पिलायें। कुछ दिन के प्रयोग से प्लीहा नष्ट हो जायेगा।

लीवर बढ़ने की आयुर्वेदिक दवा : liver badhne ki ayurvedic dawa

1-रस – लोक नाथ रस 250 मि.ग्रा. दिन में 2 बार पिप्पली+मधु+गोमूत्र से यकृत वृद्धि, एवं विद्रधिहर तथा प्लीहा के बढ़े हुए ऊतकों को घटाने के लिए उपयोगी है।
2-वृ. लोकनाथ रस-मात्रा 125 मि.ग्रा. दिन में 2 बार दें।
3-अन्यादि रस-250 से 500 मि.ग्रा. दिन में 2 बार सैन्धव+जल से। यह दीपन, पाचन, एवं यकृत-प्लीहा वृद्धि हर है।
4-वासुकी भूषण रस-मात्रा उपयुक्तै, अर्कमूल चूर्ण+जल से दें।
5-नृपति बल्लभ रस-250 मि.ग्रा. दिन में 2 बार कुटजारिष्ट से यकृत वृद्धि की जीर्ण अवस्था में दें।
6-अश्व कंचुकी रस-125 से 500 मि.ग्रा. जल से, यकृत प्लीहा वृद्धिहर है। प्लीहार्णव रस उपयुक्त मात्रा में पिप्ली पत्र स्वरस+मधु से दें प्लीहा नाशक है।
7-प्लीहा नाशक रस-गो मूत्र से दें। मात्रा 100 मि.ग्रा. यकृत, प्लीहा हर है।
8-प्लीहान्तक रस-उपयुक्त मात्रा में जल से, प्लीहा शार्दूल रस उपयुक्त मात्रा में-जल से दें या शरपुंखा चूर्ण+मधु से दें।
9-नाराच रस-मात्रा 125 से 250 मि.ग्रा. प्रात: गौमूत्र या जल से दें।
10-विद्याधर रस-मात्रा 100 मि.ग्रा. शरपुंखा चूर्ण मधु से दें। उपरोक्त सभी रस यकृत प्लीहा वृद्धि हर हैं।
11-ताम्र पर्पटी-125 से 250 मि.ग्रा. दिन में 2 बार पुनर्नवासव से दें
12-लौह पर्पटी, मान्डूर पर्पटी–मात्रा एवं अनुमान उपयुक्तं यह सभी पर्पटी यकृत-प्लीहा वृद्धिहर है।
13-नवायस लौह-500 मि.ग्रा. दिन में दो बार गोमूत्र से दें। यकृतारि रस-250 से 500 मि.ग्रा. दिन में दो बार कुमारी स्वरस+मधु से दें।
14-रोहितक लौह-यात्रा व अनुपान उपरोक्त ।
15-यकृत-प्लीहारि लौह-125 से 250 मि.ग्रा. दिन में 2-3 बार-उपयुक्त अनुपान से दें।
16-धात्री लौह- 500 मि.ग्रा. दिन में 1-2 बार मधु से दें। ताप्यादि लौह- 250 मि.ग्रा. दिन में 2-3 बार मधु से दें।
17-सर्वेश्वर लोह-मात्रा-व अनुपान उपयुक्त। महामृत्युन्जय लौह-उपयुक्त मात्रा में कुमारी स्वरस मधु से दें।
18-अग्नि कुमार लौह-मात्रा व अनुमान उपयुक्तं । उक्त सभी लौह-यकृतप्लीहा वृद्धि हर हैं।
19- पुनर्नवादि मान्डूर- 500 मि.ग्रा. से 1 ग्राम तक पुनर्नवादि क्वाथ पिप्पली+मधु से दें।
20-मधुमान्डूर-मात्रा व अनुपान उपर्युक्त।

नोट :- किसी भी औषधि को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक या सम्बंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ से राय अवश्य ले ।

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