कारण :

मलेरिया का बुखार ज्यादातर बारिश के मौसम में होता हैं। इसका अभिप्राय यह हैं कि यह बुखार मच्छरों के द्वारा फैलता है। यह मच्छर पानी के गड्डो, पोखरों, नलियों आदि के रूके हुए पानी में पैदा होते हैं। एनोफिलीज़ नामक मच्छर मरीज का खून चूस लेते हैं। यही परजीवी युक्त मच्छर जब किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटते हैं, तो वह इस रोग से पीड़ित हो जाता है।

लक्षण :

मलेरिया बुखार में रोगी के सिर में दर्द, जी मिचलाना, उल्टी होना, ठंड़ लगकर तेज बुखार का चढ़ना, बुखार उतरते समय पसीना आना आदि लक्षण पाए जाते हैं।

उपचार :

पहला प्रयोगः इन्द्रजौ, नागरमोथ, पित्तपापड़ा, कटुकी प्रत्येक का आधा से 1 ग्राम चूर्ण दिन में तीन बार खाने से मलेरिया में लाभ होता है।

दूसरा प्रयोगः तुलसी के हरे पत्तों तथा काली मिर्च को बराबर मात्रा में लेकर, बारीक पीसकर गुंजा जितनी गोली बनाकर छाया में सुखावें। 2-2 गोली तीन-तीन घण्टे के अन्तर से पानी के साथ लेने से मलेरिया में लाभ होता है।

तीसरा प्रयोगः नीम अथवा तुलसी का 20 से 50 मि.ली. काढ़ा या तुलसी का रस 10 ग्राम और अदरक का रस 5 ग्राम पीने से मलेरिया में लाभ होता है।

चौथा प्रयोगः करेले के 1 तोला रस में 2 से 5 ग्राम जीरा डालकर पीने से अथवा रात्रि में पुराने गुड़ के साथ जीरा खिलाने से लाभ होता है।

मलेरिया की अक्सीर (रामबाण) औषधिः

मलेरिया का बुखार लोगों को अलग-अलग प्रकार से आता है। मुख्यरूप से उसमें शरीर टूटता है, सिर दुःखता है, उल्टी होती है। कभी एकांतरा और कभी मौसमी रूप से भी मलेरिया का बुखार आता है और कई बार यह जानलेवा भी सिद्ध होता है।

इसकी एक सरल, सस्ती तथा ऋषिपरम्परा से प्राप्त औषधि हैः हनुमानजी को जिसके पुष्प चढ़ते हैं उस आकड़े की ताजी, हरी डाली को नीचे झुकाकर (ताकि दूध नीचे न गिरे) उँगली जितनी मोटी दो डाली काट लें। फिर उन्हें धो लें। धोते वक्त कटे हिस्से को उँगली से दबाकर रखें ताकि डाली का दूध न गिरे। एक स्टील की तपेली में 400 ग्राम दूध (गाय का हो तो अधिक अच्छा) गर्म करने के लिए रखें। उस दूध को आकड़े की दोनों डण्डियों से हिलाते जायें। थोड़ी देर में दूध फट जायेगा। जब तक मावा न तैयार हो जाये तब तक उसे आकड़े की डण्डियों से हिलाते रहें। जब मावा तैयार हो जाये तब उसमें मावे से आधी मिश्री अथवा शक्कर डालकर (इलायची-बादाम भी डाल सकते हैं) ठण्डा होने पर एक ही बार में पूरा मावा मरीज को खिला दें। किन्तु बुखार हो तब नहीं, बुखार उतर जाने पर ही खिलायें।

इस प्रयोग से मरीज को कभी दुबारा मलेरिया नहीं होगा। रक्त में मलेरिया की ‘रींग्स’ दिखेंगी तो भी बुखार नहीं आयेगा और मलेरिया के रोग से मरीज सदा के लिए मुक्त हो जायेगा। 1 से 6 वर्ष के बालकों पर यह प्रयोग नहीं किया गया है। 6 से 12 वर्ष के बालकों के लिए दूध की मात्रा आधी अर्थात् 200 ग्राम लें और उपरोक्तानुसार मावा बनाकर खिलायें।

अभी वर्तमान में जिसे मलेरिया का बुखार न आता हो वह भी यदि इस मावे का सेवन करे तो उसे भी भविष्य में कभी मलेरिया न होगा। दिमाग के जहरी मलेरिया में भी यह प्रयोग अक्सीर इलाज का काम करता है। अतः यह प्रयोग सबके लिए करने जैसा है।

विभिन्न औषधियों से उपचार-

तुलसी :

  1. काली तुलसी या मरूवे के 4 पत्ते, बबूल के 4 पत्ते, काली मिर्च 4 पीसी तथा अजवाचन 1 ग्राम को एकसाथ पीसकर पकाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े के ठंड़ा हो जाने पर बुखार चढ़ने से पहले पिलाने से बच्चों का मलेरिया का बुखार ठीक हो जाता है।
  2. तुलसी के 15 पत्ते, 10 काली मिर्च और 2 चम्मच चीनी को एक कप पानी में उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े की 3 खुराक दिन में 3 बार लेने से मलेरिया बुखार में लाभ मिलता है।
  3. तुलसी के 10 पत्ते, 5 ग्राम करंज की गिरी, 10 दाने काली मिर्च तथा 5 ग्राम जीरे आदि को पीसकर छोटी-छोटी गोलियां बना लें। दिन में 3 बार इन 2-2 गोलियों का सेवन करने से मलेरिया में लाभ होता है।
  4. 10 ग्राम तुलसी के पत्ते और 7 कालीमिर्च को पानी में पीसकर सुबह और शाम लेते रहने से मलेरिया बुखार ठीक होता है।
  5. तुलसी के 22 पत्ते और 20 पिसी हुई कालीमिर्च को 2 कप पानी में डालकर उबाल लें। जब पानी चौथाई भाग रह जाये तब इसमें मिश्री मिलाकर ठंड़ा करके पीने से मलेरिया बुखार में लाभ होता है।
  6. तुलसी के पत्ते और कालीमिर्च को एकसाथ मिलाकर सेवन करने से मलेरिया के बुखार में आराम मिलता है।
  7. तुलसी के पत्तों को प्रतिदिन सेवन करने से मलेरिया नहीं होता है। यदि मलेरिया हो जाए तो बुखार उतरने पर सुबह के समय तुलसी के 15 पत्ते और 10 कालीमिर्च खाने से मलेरिया बुखार दुबारा नहीं होता है।

चिरायता :

  1. 10 ग्राम चिरायते के रस को 10 मिलीलीटर संतरे के रस में मिलाकर मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को दिन में 3 बार पिलाने से लाभ होता है।
  2. चिरायते का काढ़ा 1 कप की मात्रा में दिन में 3 बार कुछ दिनों तक नियमित पीने से मलेरिया रोग के सारे कष्टों में शीघ्र आराम मिलता है।

पित्तपापड़ा : 6 ग्राम पित्तपापड़ा और 3 ग्राम धनिया को एकसाथ मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से पुराने बुखार में शान्ति मिलती है।

पीपल : पीपल के 3 पत्तों को पीसकर शहद में मिलाकर चाटने से श्वास (दमा), खांसी के साथ मलेरिया बुखार भी ठीक होता है।

गिलोय :

  1. गिलोय का 5 अंगुल लम्बा टुकड़ा और 15 कालीमिर्च को मिलाकर और कूटकर 250 मिलीलीटर पानी में डालकर उबाल लें। जब यह पानी लगभग 50 मिलीलीटर की मात्रा में रह जाए तो इसे छानकर पीने से मलेरिया का बुखार दूर हो जाता है।
  2. गिलोय (गुरूच) के काढ़े या रस में छोटी पीपल और शहद को मिलाकर 40 से 80 मिलीलीटर की मात्रा में रोजाना सेवन करने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता हैं।

कलौंजी : आधा चम्मच पिसी हुई कलौजी को 1 चम्मच शहद में मिलाकर चाटने से चौथे दिन आने वाला बुखार ठीक हो जाता है।

अपामार्ग : अपामार्ग के पत्ते और कालीमिर्च को बराबर की मात्रा में लेकर पीस लें। फिर इसमें थोड़ा-सा गुड़ मिलाकर मटर के दानों के बराबर की गोलियां तैयार कर लें। जब मलेरिया फैल रहा हो, उन दिनों यह 1-1 गोली सुबह-शाम भोजन करने के बाद नियमित रूप से सेवन करने से मलेरिया के बुखार का शरीर पर आक्रमण नहीं होगा। इन गोलियों का 2-4 दिन सेवन करना पर्याप्त होता है।

अतीस : 1 ग्राम अतीस के चूर्ण और 2 कालीमिर्च के चूर्ण को एकसाथ मिलाकर दिन में 3-4 बार पानी से सेवन करने से मलेरिया का बुखार दूर हो जाता है।